अमेरिका-रूस
दुनिया आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है क्योंकि अमेरिका और रूस के बीच आख़िरी बचे परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते — New Strategic Arms Reduction Treaty (New START) — समापन को पहुँच चुका है। यह समझौता, जो वर्षों तक दोनों महाशक्तियों के बीच परमाणु हथियारों की संख्या और तैनाती पर नियंत्रण रखता था, अब औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु नियंत्रण की अवधि में पहली बार पाँच दशक से अधिक समय बाद कोई वैध प्रतिबंध नहीं रह गया है — एक स्थिति जिसने वैश्विक सुरक्षा के संतुलन को हिला दिया है।
New START क्या था?
New START संधि को 2010 में अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूस के राष्ट्रपति दिमित्रि मेडवेदेव ने साइन किया था। इसका लक्ष्य दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु हथियारों की संख्या को सीमित करना और निरीक्षण तथा सत्यापन प्रक्रियाओं के ज़रिये पारदर्शिता सुनिश्चित करना था। मूल रूप से इसने निम्नलिखित प्रमुख प्रतिबंध लगाए थे:
यह समझौता शीत युद्ध के बाद के समय में परमाणु नियंत्रण की सबसे मजबूत कड़ी था और इसके कारण युद्ध के सबसे खतरनाक मंच — रणनीतिक परमाणु हथियारों की दौड़ — पर नियंत्रण कायम रहा।
विस्तार प्रस्ताव और ट्रंप का निर्णय
समझौते की वैधता पहले ही 2021 में एक बार विस्तारित हो चुकी थी, लेकिन अब कोई औपचारिक विस्तार संभव नहीं रहा। रूस के राष्ट्रपति **व्लादिमिर पुतिन ने अमेरिका से प्रस्ताव किया कि दोनों देश समझौते की युद्ध-नियंत्रण सीमाओं को एक साल तक और स्वेच्छा से लागू रखें — एक उपाय जो कम से कम वर्तमान संतुलन को बनाए रख सके।
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। ट्रंप ने कहा कि New START “खराब तरीके से सौदा किया गया था” और यह समझौता “संभवतः उल्लंघन हो रहा है”, इसलिए इसे बढ़ाने की बजाय एक “नई, आधुनिक और अधिक व्यापक संधि” पर काम होना चाहिए। उनके अनुसार, ऐसी संधि में चीन को भी शामिल किया जाना चाहिए, जो विश्व की तीसरी सबसे बड़ी परमाणु शक्ति बन रही है।
ट्रंप के इस फैसले का मतलब यह है कि वर्तमान में कोई भी औपचारिक बाध्यकारी सीमा नहीं बची है जो अमेरिका और रूस जैसे परमाणु महाशक्तियों को उनके हथियारों को असीमित रूप से तैनात करने या बढ़ाने से रोके।
इस फैसले से दुनिया भर में सुरक्षा चिंताओं का स्तर बढ़ गया है। विशेषज्ञों और रक्षा विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि New START समझौते का अंत एक नई परमाणु हथियारों की दौड़ की राह खोल सकता है, जिसमें न केवल अमेरिका और रूस बल्कि अन्य देशों के बीच भी रणनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक नीति-विशेषज्ञों ने भी कहा है कि यह स्थिति वैश्विक स्थिरता और रणनीतिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा है, क्योंकि अब किसी भी पक्ष पर औपचारिक प्रतिबंध नहीं बचा है। जो लोग समझौते के पक्ष में थे, वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कम से कम मौजूदा सीमाओं का एक अंतरिम विस्तार होना चाहिए ताकि डिप्लोमैटिक प्रयासों के लिए समय मिल सके।
चीन का दृष्टिकोण
चीन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह वर्तमान में ट्रंप-प्रस्तावित नए परमाणु समझौते में भाग लेने के लिए तैयार नहीं है। चीन का कहना है कि उसका परमाणु शस्त्रागार पर्याप्त रूप से कम और राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप है, इसलिए वह ऐसी वार्ता का हिस्सा होने को “तर्कसंगत या वास्तविक” नहीं मानता। यह भी दर्शाता है कि चीन की भूमिका परमाणु नियंत्रण वार्ताओं में महत्वपूर्ण लेकिन जटिल बनी हुई है।
संभावित प्रभाव
New START का समाप्त होना रणनीतिक स्थिरता के एक दशक-पुराने ढांचे के अंत को चिह्नित करता है। इसके संभावित प्रभावों में शामिल हैं:
आज का यह निर्णय यह दर्शाता है कि परमाणु हथियार नियंत्रण की दुनिया एक नए युग में प्रवेश कर रही है, जहां पुराने समझौते समाप्त हो रहे हैं और नई रणनीतिक चुनौतियाँ उभर रही हैं। ट्रंप प्रशासन का निर्णय, रूस की प्रतिक्रिया, चीन की अस्वीकृति और विश्व-व्यापी चिंता मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाती हैं जिसमें वैश्विक सुरक्षा के ढांचे में बड़ा बदलाव संभव है। इसके परिणाम आने वाले महीनों और वर्षों में व्यापक रूप से महसूस किए जा सकते हैं।
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