ईरान जंग के बीच अमेरिका की सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव किया गया है। पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में तैनात अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को अब मध्य पूर्व भेजा जा रहा है। इसे लंबे समय से ईरान के खिलाफ अभियान में तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह भेजा जाएगा। इस फैसले से अमेरिकी नौसेना पर बढ़ते दबाव की तस्वीर सामने आई है। साथ ही, पश्चिमी प्रशांत में अमेरिकी नौसैनिक मौजूदगी अस्थायी रूप से कमजोर होने से चीन के लिए रणनीतिक अवसर बनने की चर्चा तेज हो गई है।

जॉर्ज वाशिंगटन को क्यों हटाया गया?
अमेरिकी नौसेना की ओर से यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को पश्चिमी प्रशांत से हटाकर मध्य पूर्व भेजने की तैयारी की गई है। इसे अरब सागर क्षेत्र में पहुंचाया जाएगा, जहां यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह ली जाएगी।
अब्राहम लिंकन की तैनाती 250 दिनों से ज्यादा लंबी हो चुकी है। रिपोर्टों के अनुसार, जहाज लंबे समय से समुद्र में बना हुआ है और उसके चालक दल पर लगातार अभियान का दबाव बढ़ा है।
ईरान जंग : लिंकन के चालक दल पर बढ़ा दबाव
ईरान जंग के दौरान अमेरिकी नौसेना के सामने सिर्फ सैन्य चुनौती नहीं रही है। लंबे समय तक समुद्र में रहने के कारण जवानों की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर भी असर पड़ने की खबरें सामने आई हैं।
कुछ रिपोर्टों में पानी की कमी, सप्लाई संबंधी परेशानियों, प्लंबिंग समस्याओं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं का उल्लेख किया गया है। इन परिस्थितियों को लेकर सैनिकों के परिवारों और कुछ सांसदों की ओर से भी चिंता जताई गई है।
चीन को क्यों मिला फायदा?
जॉर्ज वाशिंगटन के पश्चिमी प्रशांत से हटने के बाद इस क्षेत्र में अमेरिकी विमानवाहक पोत की मौजूदगी अस्थायी रूप से कम हो जाएगी। यही स्थिति चीन के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की सैन्य गतिविधियां पहले से बढ़ी हुई हैं। ऐसे समय में अमेरिकी नौसैनिक मौजूदगी में कमी को बीजिंग के लिए रणनीतिक अवसर के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन इस दौरान अपनी समुद्री गतिविधियों और क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर सकता है।
ईरान जंग ने बढ़ाया अमेरिकी नौसेना पर बोझ
ईरान के साथ लंबे समय से चल रहे सैन्य अभियान के कारण अमेरिकी नौसेना के संसाधनों पर दबाव बढ़ा है। विमानवाहक पोतों की लगातार तैनाती, हथियारों और अन्य सैन्य सामग्री की जरूरत तथा चालक दल की लंबी ड्यूटी से समस्या और बढ़ी है।
अब्राहम लिंकन की तैनाती को कई बार बढ़ाया गया है। अमेरिकी नौसेना के लिए ऐसे लंबे अभियानों को लगातार जारी रखना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
ट्रंप की रणनीति पर उठे सवाल
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान नीति के कारण अमेरिका का सैन्य ध्यान बड़े स्तर पर मध्य पूर्व की ओर केंद्रित हुआ है। इसी वजह से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकी मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
हालांकि, जॉर्ज वाशिंगटन की तैनाती को एक नियमित रोटेशन और लिंकन को राहत देने की जरूरत से भी जोड़ा जा रहा है। इसलिए इसे केवल चीन के खिलाफ अमेरिकी रणनीति में बदलाव के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
चीन के लिए कितना बड़ा मौका?
पश्चिमी प्रशांत में अमेरिकी विमानवाहक पोत की अनुपस्थिति स्थायी नहीं है, लेकिन कुछ समय के लिए शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है। चीन की ओर से इस स्थिति का इस्तेमाल अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ाने और क्षेत्रीय दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिका के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ ईरान युद्ध में सैन्य दबाव को बनाए रखना है, तो दूसरी तरफ चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच इंडो-पैसिफिक में अपनी ताकत और सहयोगियों का भरोसा कायम रखना है।
आगे क्या होगा?
यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन का मध्य पूर्व जाना अमेरिकी नौसेना के लिए तत्काल राहत का कदम माना जा रहा है। इससे अब्राहम लिंकन के चालक दल को लंबी तैनाती के बाद राहत मिल सकेगी।
लेकिन पश्चिमी प्रशांत में अमेरिकी विमानवाहक पोत की अस्थायी कमी से चीन पर नजर रखना भी जरूरी होगा। आने वाले दिनों में यह देखा जाएगा कि अमेरिका इस सैन्य संतुलन को कैसे बनाए रखता है और ईरान युद्ध के बीच इंडो-पैसिफिक में अपनी रणनीतिक मौजूदगी को किस तरह मजबूत करता है।
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