अदालत ने जिस मामले में यह फैसला सुनाया है, वह तेलंगाना से संबंधित है। इस मामले में याचिकाकर्ता को प्रति माह 20 हजार रुपये का अंतरिम गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता, जो एक मुस्लिम महिला है, ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दाखिल कर अपने पति से गुजारा भत्ते की मांग की थी। इस फैसले को हाई कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि दंपति ने 2017 में मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार तलाक ले लिया था।
महिला के पति मोहम्मद अब्दुल समद ने परिवार अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने पति की याचिका पर गुजारा भत्ता को संशोधित कर 10 हजार रुपये प्रति माह कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने पारिवारिक अदालत को इस मामले का निपटारा छह महीने के भीतर करने का निर्देश दिया था।
इस मामले में, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 को देखते हुए, एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत लाभ का दावा करने की हकदार नहीं है। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि 1986 का अधिनियम मुस्लिम महिलाओं के लिए अधिक फायदेमंद है।