February 4, 2026
संसद का शीतकालीन सत्र

संसद का शीतकालीन सत्र: महंगाई और बेरोज़गारी पर घमासान, सरकार–विपक्ष आमने-सामने

संसद का शीतकालीन सत्र एक बार फिर राजनीतिक हलचल का केंद्र बना हुआ है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में आज भी हंगामे के आसार दिखाई दे रहे हैं। विपक्षी दलों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे महंगाई, बेरोज़गारी और आम जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेरने की पूरी तैयारी में हैं। वहीं सरकार का कहना है कि वह सभी सवालों का जवाब देने को तैयार है, लेकिन विपक्ष अनावश्यक हंगामा कर संसद की कार्यवाही बाधित कर रहा है।

महंगाई बना सबसे बड़ा मुद्दा

देश में बढ़ती महंगाई लंबे समय से आम जनता की परेशानी बनी हुई है। खाद्य पदार्थों की कीमतें, रसोई गैस, पेट्रोल और डीज़ल के दाम आम आदमी की जेब पर सीधा असर डाल रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार महंगाई पर नियंत्रण पाने में विफल रही है। विपक्षी सांसद मांग कर रहे हैं कि इस मुद्दे पर संसद में विस्तृत चर्चा हो और सरकार स्पष्ट बताए कि आने वाले समय में महंगाई कम करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।

सरकार का पक्ष यह है कि वैश्विक परिस्थितियों, अंतरराष्ट्रीय बाजार और भू-राजनीतिक तनावों के कारण कीमतों पर असर पड़ा है। साथ ही सरकार यह भी दावा कर रही है कि आवश्यक वस्तुओं पर सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए आम जनता को राहत देने की कोशिश की जा रही है।

बेरोज़गारी पर तीखी बहस के संकेत

महंगाई के साथ-साथ बेरोज़गारी भी विपक्ष का प्रमुख हथियार बनी हुई है। विपक्षी दलों का कहना है कि देश में युवाओं को पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पा रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी, सरकारी भर्तियों में कमी और निजी क्षेत्र में अस्थिरता जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

विपक्ष का आरोप है कि सरकार रोजगार के वादों को पूरा करने में असफल रही है। दूसरी ओर, सरकार का दावा है कि स्टार्टअप, मेक इन इंडिया और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा किए गए हैं। सरकार यह भी कहती है कि आंकड़ों के आधार पर रोजगार की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।

संसद का शीतकालीन सत्र : संसद में हंगामे की स्थिति

सत्र के शुरुआती दिनों से ही संसद में नारेबाजी और वॉकआउट देखने को मिला है। विपक्षी सांसद सदन में पोस्टर और तख्तियां लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है। कई बार स्पीकर को सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी है।

सत्ता पक्ष का आरोप है कि विपक्ष जानबूझकर संसद नहीं चलने देना चाहता, ताकि जनहित से जुड़े विधेयकों पर चर्चा न हो सके। वहीं विपक्ष का कहना है कि जब तक सरकार संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार नहीं होगी, तब तक विरोध जारी रहेगा।

 

 

सरकार का विधायी एजेंडा

हंगामे के बीच सरकार का जोर अपने विधायी एजेंडे पर है। सरकार इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराना चाहती है, जिनमें आर्थिक सुधार, डिजिटल व्यवस्था और प्रशासनिक बदलाव से जुड़े प्रस्ताव शामिल हैं। सरकार का कहना है कि इन विधेयकों का उद्देश्य देश के विकास को गति देना और शासन व्यवस्था को और मजबूत बनाना है।

सरकार यह भी अपील कर रही है कि विपक्ष सहयोग करे ताकि संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चल सके और देशहित के फैसले लिए जा सकें।

जनता की नजर संसद पर

संसद का शीतकालीन सत्र केवल राजनीतिक दलों के लिए नहीं, बल्कि आम जनता के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। लोग उम्मीद करते हैं कि उनके रोज़मर्रा के मुद्दों—जैसे महंगाई, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य—पर गंभीर चर्चा होगी और समाधान निकलेगा। जब संसद में बार-बार हंगामा होता है, तो जनता में निराशा भी बढ़ती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों संवाद के जरिए समाधान निकालें। विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन संसद की कार्यवाही ठप होना किसी के हित में नहीं है।

आगे क्या?

आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार और विपक्ष के बीच कोई सहमति बन पाती है या नहीं। यदि बातचीत का रास्ता निकलता है, तो महंगाई और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर सार्थक चर्चा संभव है। वहीं अगर टकराव जारी रहा, तो संसद का कीमती समय हंगामे की भेंट चढ़ सकता है।

कुल मिलाकर, संसद का शीतकालीन सत्र देश की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। अब यह जिम्मेदारी सभी राजनीतिक दलों पर है कि वे जनता की उम्मीदों पर खरा उतरें।