यूरोपीय रक्षा
हाल के वर्षों में वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य तेजी से बदला है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व में तनाव, चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और अमेरिका की बदलती विदेश नीति ने यूरोप को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उसकी सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत है। इसी पृष्ठभूमि में यूरोपीय रक्षा पर नई रणनीति को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हुई है। इस बहस का केंद्र बिंदु है NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) और उसकी भविष्य की भूमिका।
NATO और यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था
NATO की स्थापना 1949 में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य यूरोप और उत्तरी अमेरिका को किसी बाहरी हमले से सुरक्षित रखना था। दशकों तक यूरोप की सुरक्षा का बड़ा बोझ अमेरिका ने उठाया। अमेरिकी सैन्य शक्ति, हथियार और फंडिंग के भरोसे यूरोपीय देश अपेक्षाकृत निश्चिंत रहे। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं।
अमेरिका पर निर्भरता कम करने की जरूरत
यूरोपीय नेताओं का मानना है कि केवल अमेरिका पर निर्भर रहना अब जोखिम भरा हो सकता है। अमेरिका की घरेलू राजनीति, बजट सीमाएँ और “America First” जैसी नीतियाँ इस बात का संकेत देती हैं कि भविष्य में वह यूरोप की सुरक्षा को पहले जैसी प्राथमिकता न दे। ऐसे में यूरोप को अपनी स्वतंत्र रक्षा क्षमता विकसित करनी होगी।

यूरोपीय रक्षा : “नए NATO” की अवधारणा
नई रणनीति में NATO को केवल अमेरिकी नेतृत्व वाला संगठन न मानकर, एक संतुलित और साझा जिम्मेदारी वाला गठबंधन बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसका अर्थ है कि यूरोपीय देश अपने रक्षा बजट में वृद्धि करें, आधुनिक हथियार प्रणाली विकसित करें और संयुक्त सैन्य अभ्यास को मजबूत बनाएं।
रक्षा बजट और सैन्य क्षमता
NATO के नियमों के अनुसार, सदस्य देशों को अपनी GDP का कम से कम 2% रक्षा पर खर्च करना चाहिए। लेकिन लंबे समय तक कई यूरोपीय देश इस लक्ष्य से पीछे रहे। अब जर्मनी, फ्रांस, पोलैंड और अन्य देशों ने अपने रक्षा खर्च को बढ़ाने की घोषणा की है। इससे यूरोप की सैन्य ताकत मजबूत होगी और अमेरिका पर निर्भरता कम होगी।
रूस-यूक्रेन युद्ध का प्रभाव
रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप को यह एहसास दिलाया कि युद्ध अब केवल इतिहास की बात नहीं रहा। सीमाओं के पास सैन्य खतरे वास्तविक हैं। इसी कारण पूर्वी यूरोप के देश NATO की भूमिका को और मजबूत देखना चाहते हैं, जबकि पश्चिमी यूरोप अधिक आत्मनिर्भर बनने पर जोर दे रहा है।
यूरोपीय संघ और रक्षा सहयोग
यूरोपीय संघ (EU) भी अपनी अलग रक्षा नीति पर काम कर रहा है। “यूरोपियन डिफेंस यूनियन” की अवधारणा के तहत साझा हथियार निर्माण, साइबर सुरक्षा और खुफिया जानकारी साझा करने की योजनाएँ बनाई जा रही हैं। इसका उद्देश्य है कि संकट के समय यूरोप अकेले भी अपनी रक्षा कर सके।
यूरोपीय रक्षा : चुनौतियाँ और मतभेद
हालाँकि यह रास्ता आसान नहीं है। यूरोपीय देशों के बीच राजनीतिक मतभेद, आर्थिक असमानता और सैन्य प्राथमिकताओं में अंतर है। कुछ देश अभी भी अमेरिका की मजबूत भूमिका को जरूरी मानते हैं, जबकि कुछ पूर्ण आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना चाहते हैं। इन मतभेदों को सुलझाना नई रणनीति की सबसे बड़ी चुनौती है।
भविष्य की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में NATO पूरी तरह कमजोर नहीं होगा, बल्कि उसका स्वरूप बदलेगा। अमेरिका और यूरोप के बीच जिम्मेदारियों का संतुलन बनेगा। यूरोप अधिक आत्मनिर्भर होगा, लेकिन NATO के ढांचे के भीतर सहयोग जारी रहेगा।
यूरोपीय रक्षा पर नई रणनीति केवल सैन्य बदलाव नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक और रणनीतिक सोच में बदलाव का संकेत है। NATO अब पुराने ढर्रे पर नहीं चल सकता। यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए आगे आना होगा और अमेरिका को साझेदार के रूप में देखना होगा, न कि एकमात्र रक्षक के रूप में। यह बदलाव आने वाले दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन को नई दिशा देगा।


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