February 4, 2026
मनरेगा

मनरेगा के नाम बदलने के खिलाफ कांग्रेस का देशव्यापी प्रदर्शन

ग्रामीण भारत और राजनीति में तेज़ होती बहस

देश की राजनीति में एक बार फिर मनरेगा (MGNREGA) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के नाम में बदलाव की संभावनाओं पर कांग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है। इसी के तहत आज कांग्रेस ने देशभर में nationwide प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। पार्टी का कहना है कि मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण गरीबों के लिए रोजगार और सम्मान का अधिकार है।

क्या है मनरेगा और क्यों है इतना महत्वपूर्ण

मनरेगा की शुरुआत वर्ष 2005 में की गई थी। इसका उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में हर परिवार को साल में कम से कम 100 दिनों का रोज़गार उपलब्ध कराना है। यह योजना किसानों, मज़दूरों, दलितों और आदिवासियों के लिए आर्थिक सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती है। मनरेगा ने ग्रामीण पलायन को कम करने और गांवों में बुनियादी ढांचे के विकास में बड़ी भूमिका निभाई है।

मनरेगा : नाम बदलने को लेकर क्यों है विवाद

कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार मनरेगा के नाम से “महात्मा गांधी” शब्द हटाने की तैयारी में है। पार्टी का कहना है कि यह केवल नाम बदलने का मामला नहीं, बल्कि इतिहास और विचारधारा को मिटाने की कोशिश है। कांग्रेस नेताओं के अनुसार, गांधी नाम हटाने से योजना की आत्मा और इसके सामाजिक संदेश पर असर पड़ेगा।

कांग्रेस का रुख और रणनीति

कांग्रेस ने साफ किया है कि वह मनरेगा के नाम या स्वरूप में किसी भी बदलाव का डटकर विरोध करेगी। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि मनरेगा देश के गरीबों की जीवनरेखा है और इसके साथ किसी भी तरह का राजनीतिक प्रयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
देश के कई राज्यों में जिला मुख्यालयों पर धरना-प्रदर्शन, रैलियां और ज्ञापन सौंपने की योजना बनाई गई है।

 

मनरेगा

 

सरकार का पक्ष क्या है

हालांकि केंद्र सरकार की ओर से अभी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं का कहना है कि योजनाओं का नाम बदलना कोई नई बात नहीं है। उनका तर्क है कि सरकार योजनाओं की कार्यप्रणाली सुधारने पर ध्यान दे रही है, न कि केवल नाम पर। फिर भी विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा बता रहा है।

ग्रामीण मज़दूरों और किसानों की चिंता

मनरेगा से जुड़े मज़दूरों और किसानों में इस मुद्दे को लेकर असमंजस की स्थिति है। कई मज़दूरों का कहना है कि नाम चाहे जो हो, उन्हें समय पर काम और मज़दूरी मिलनी चाहिए। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि नाम बदलने के बाद योजना की प्राथमिकता कम हो सकती है और बजट में कटौती का खतरा बढ़ सकता है।

राजनीतिक मायने और आगामी चुनाव

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मनरेगा का मुद्दा आने वाले चुनावों में बड़ा हथियार बन सकता है। ग्रामीण भारत में मनरेगा की पकड़ मजबूत है और इसे लेकर कोई भी फैसला सीधा वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस इसे गरीब और ग्रामीण समर्थक राजनीति से जोड़कर जनता के बीच मजबूत संदेश देना चाहती है।

विपक्षी एकजुटता की कोशिश

कांग्रेस के साथ-साथ कुछ अन्य विपक्षी दलों ने भी मनरेगा के मुद्दे पर समर्थन जताया है। इससे यह संकेत मिलते हैं कि आने वाले समय में संसद और सड़क दोनों जगह इस मुद्दे पर टकराव देखने को मिल सकता है।

निष्कर्ष

मनरेगा के नाम बदलने का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक बहस का केंद्र बन चुका है। कांग्रेस का देशव्यापी प्रदर्शन यह दर्शाता है कि विपक्ष इस मुद्दे को गंभीरता से ले रहा है। आने वाले दिनों में सरकार की ओर से स्पष्ट बयान और आगे की रणनीति इस विवाद की दिशा तय करेगी।