मुंबई में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता का मुद्दा अब विवाद का रूप लेता जा रहा है। भाषा की जांच और उससे जुड़े नियमों के विरोध में ऑटो और टैक्सी चालकों के एक गुट ने तीन दिवसीय हड़ताल शुरू कर दी है। इसका असर मुंबई की सड़कों पर दिखाई देने लगा है और कई इलाकों में यात्रियों को ऑटो-टैक्सी मिलने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
मराठी भाषा टेस्ट का विरोध क्यों?
ऑटो-टैक्सी चालकों का कहना है कि क्षेत्रीय भाषा की जानकारी की जांच के नाम पर उनसे ऐसे सवाल पूछे जा रहे हैं, जो उन्हें दी गई ट्रेनिंग या तैयारी के दौरान नहीं बताए गए थे। चालकों ने इसे ‘आउट ऑफ सिलेबस’ सवाल बताते हुए आपत्ति जताई है।
चालकों का आरोप है कि भाषा सीखने और परीक्षा की तैयारी के लिए उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया गया। उनका कहना है कि अचानक भाषा की परीक्षा और नियमों को लागू करने से बड़ी संख्या में ड्राइवरों के सामने मुश्किल खड़ी हो गई है।

मुंबई : आरटीओ कर रहा है भाषा की जांच
मुंबई में क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय यानी आरटीओ की ओर से ऑटो और टैक्सी चालकों की मराठी भाषा संबंधी जानकारी की जांच की जा रही है। प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक परिवहन सेवा से जुड़े ड्राइवर स्थानीय भाषा में यात्रियों से बुनियादी स्तर पर संवाद कर सकें।
हालांकि, चालकों का कहना है कि भाषा सीखने के लिए उन्हें उचित प्रशिक्षण और पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। उनका विरोध भाषा सीखने से ज्यादा परीक्षा की प्रक्रिया और नियम लागू करने के तरीके को लेकर है।
हड़ताल से यात्रियों की बढ़ी परेशानी
ऑटो और टैक्सी चालकों की हड़ताल का सीधा असर आम यात्रियों पर पड़ रहा है। मुंबई जैसे शहर में लाखों लोग रोजाना ऑटो और टैक्सी का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में वाहनों के सड़कों से दूर रहने पर यात्रियों को वैकल्पिक साधनों का सहारा लेना पड़ रहा है।
खासकर रेलवे स्टेशन, बाजार और प्रमुख व्यावसायिक इलाकों में यात्रियों को वाहन मिलने में दिक्कत हो सकती है। कई लोगों को बस, लोकल ट्रेन या ऐप आधारित कैब जैसी सेवाओं का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।
मुंबई : नियम बनाम चालकों की मांग
मराठी भाषा की अनिवार्यता को लेकर प्रशासन और ऑटो-टैक्सी चालकों के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं। एक तरफ स्थानीय भाषा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी तरफ चालक संगठनों का तर्क है कि नियम लागू करने से पहले उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण और तैयारी का अवसर मिलना चाहिए।
चालकों की मांग है कि भाषा परीक्षा को लेकर स्पष्ट पाठ्यक्रम और प्रक्रिया तय की जाए। साथ ही उन्हें तैयारी के लिए पर्याप्त समय दिया जाए, ताकि किसी भी चालक को अचानक परीक्षा में परेशानी न हो।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार और चालक संगठनों के बीच बातचीत से कोई समाधान निकलता है या नहीं। यदि हड़ताल लंबी चलती है तो मुंबई की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर इसका असर और बढ़ सकता है।
ऑटो-टैक्सी चालकों का कहना है कि वे नियमों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन नियमों को व्यावहारिक तरीके से लागू किया जाना चाहिए। अब यात्रियों के साथ-साथ प्रशासन की नजर भी इस बात पर है कि भाषा विवाद का समाधान बातचीत के जरिए कब तक निकलता है।

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