मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का मुंबई में Gen-Z और Gen-Alpha के साथ संवाद चर्चा में है। नई पीढ़ी के युवाओं के साथ हुए इस संवाद को सिर्फ एक सामान्य बातचीत के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे संघ की बदलती युवा रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। भागवत ने युवाओं के सवालों, उनकी सोच और विरोध के अधिकार पर जिस तरह बात की, उससे यह संकेत मिलता है कि संघ अब नई पीढ़ी के साथ संवाद का दायरा बढ़ाना चाहता है।

Gen-Z से सीधे संवाद की कोशिश
आज की Gen-Z पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से काफी अलग तरीके से सोचती है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में बड़ी हुई यह पीढ़ी सवाल पूछने, जानकारी को जांचने और अपनी राय खुलकर रखने में विश्वास करती है।
मुंबई में मोहन भागवत ने इसी पीढ़ी के साथ संवाद किया। उन्होंने युवाओं की बात सुनने और उनके सवालों को समझने पर जोर दिया। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले वर्षों में युवा मतदाता देश की राजनीति में और ज्यादा निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
विरोध करने वाला युवा देश-विरोधी नहीं
भागवत के संवाद का सबसे अहम पहलू युवाओं के विरोध और प्रदर्शन को लेकर उनका नजरिया रहा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी मुद्दे के खिलाफ आवाज उठाना अपने आप में देश-विरोधी होने का प्रमाण नहीं है।
लोकतंत्र में असहमति की अपनी जगह होती है। युवा अगर किसी नीति, व्यवस्था या सामाजिक मुद्दे को लेकर सवाल उठाता है तो पहले उसकी समस्या को समझना जरूरी है। भागवत की यह बात उस बहस के बीच महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसमें छात्र और युवा आंदोलनों को लेकर अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलते हैं।
Gen-Z रोजगार और शिक्षा युवाओं की बड़ी चिंता
नई पीढ़ी के लिए रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएं, अवसर और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। युवा सिर्फ विचारधारा या राजनीतिक नारों से प्रभावित नहीं होता। वह यह जानना चाहता है कि उसके सामने रोजगार के कितने अवसर हैं, शिक्षा कितनी बेहतर हो रही है और व्यवस्था उसकी समस्याओं का समाधान कैसे करेगी।
यही वजह है कि संघ के लिए Gen-Z तक पहुंच बनाना केवल वैचारिक संवाद का विषय नहीं है। युवाओं के वास्तविक मुद्दों को समझना और उनके साथ लगातार बातचीत करना भी उतना ही जरूरी है।
RSS और BJP के बीच कनेक्शन
RSS और BJP के बीच वैचारिक संबंध किसी से छिपे नहीं हैं। हालांकि दोनों संगठनों की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन संघ का सामाजिक नेटवर्क और BJP की राजनीतिक गतिविधियां भारतीय राजनीति में अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं।
ऐसे में मोहन भागवत का युवाओं के साथ संवाद BJP के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश माना जा सकता है। अगर संघ नई पीढ़ी की बदलती सोच को समझने की कोशिश कर रहा है, तो इसका असर व्यापक राजनीतिक संवाद पर भी पड़ सकता है।
युवा वर्ग को केवल चुनावी समर्थन के नजरिए से देखने के बजाय उसके सवालों और असहमति को जगह देना BJP और संघ दोनों के लिए जरूरी हो सकता है।
सोशल मीडिया ने बदली युवाओं की राजनीति
Gen-Z के राजनीतिक व्यवहार को सोशल मीडिया ने पूरी तरह बदल दिया है। Instagram, YouTube और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए युवा कुछ ही मिनटों में किसी मुद्दे पर अलग-अलग विचार देख सकता है।
इस पीढ़ी के लिए नेता की लोकप्रियता से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी विश्वसनीयता और जवाबदेही हो सकती है। यही कारण है कि राजनीतिक संगठनों के सामने चुनौती केवल युवाओं तक पहुंचने की नहीं, बल्कि उनसे भरोसेमंद संवाद स्थापित करने की भी है।
मोहन भागवत का युवा संवाद इसी बदलते राजनीतिक माहौल में संघ की पहुंच बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।
Gen-Z क्या बदलेगी BJP की युवा रणनीति?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या संघ प्रमुख का यह संवाद BJP की युवा रणनीति को भी प्रभावित करेगा? आने वाले समय में रोजगार, शिक्षा, डिजिटल आजादी, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं की भागीदारी जैसे मुद्दे राजनीतिक दलों के लिए और महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
अगर युवाओं को सिर्फ वोट बैंक के बजाय देश के सक्रिय नागरिक के रूप में शामिल किया जाता है, तो इससे राजनीतिक संवाद का स्वरूप भी बदल सकता है।
मोहन भागवत का Gen-Z और Gen-Alpha के साथ संवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें नई पीढ़ी की बात सुनने और उसके सवालों को समझने का संदेश दिखाई देता है। विरोध को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा मानना और युवाओं को सीधे संवाद में शामिल करना संघ की युवा पहुंच को एक नया रूप दे सकता है।
अब देखना होगा कि यह पहल केवल एक संवाद कार्यक्रम तक सीमित रहती है या आने वाले समय में RSS और BJP की युवा रणनीति में इसका व्यापक असर दिखाई देता है।

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